Shabd jo kabhi sunai na diye

आँखों की नमी को ख़ुशी के आंसू बताना , कहना सब कुछ ठीक है फिर थोडा मुस्कुराना , भले दिल में हो दर्द पर हमदर्द बन जाना , देखा, कितना आसान है किसी भी गम को छुपाना ||

Saturday, April 23, 2011

गुरु तुम्हे नमन

हे     श्रमणों     के उन्नायक , गुरुवर अविकारी तुम्हे नमन |
जीवन निर्माता शिल्पिकार , हे गुणों के आगर तुम्हे नमन ||
हे काव्य सृजक साहित्यकार ,हे तपो निधि गुरु तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

हे सौम्य स्वभावी समताधारी , हे करुना सागर तुम्हे नमन |
 जिन धर्म प्रभावक ओजस्वी,हे त्याग मूर्ति गुरु तुम्हे नमन ||
हे जिनवानी के उदघोषक,हे वात्सल्य मूर्ति गुरु तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

हे संत शिरोमणि मुनि प्रवर ,हे ज्ञान उजागर तुम्हे नमन |
हे कठिन साधना में निरत , हे ज्ञान के सागर तुम्हे नमन ||
हे     अमित     गुणों के भंडारी , हे वाणी भूषण तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

Friday, April 15, 2011

जन्म कल्याणक

आकुलित हुई मानवता थी 
थी बढती हिंसा की धारा | 
तम घोर घनेरा था छाया 
था चिंतित विश्व विकट सारा || 

तब माँ त्रिशला उदयाचल बन
तमहर  दिनकर  लेकर आयीं |
फिर देख वीर  की मुख मुद्रा 
सारे जग  में खुशियाँ छायी ||

हर्षित थी नगरी कुण्डलपुर 
देवों  में खुशियाँ  थी छायीं |
था गर्व  पिता की आँखों में
माँ की अँखियाँ भी भर आयीं ||

पाने को एक  छवि  प्रभु की
वह इन्द्र जमीं पर आया था |
कर नेत्र हजारों से दर्शन ||
मन तृप्त  नहीं कर पाया था ||

अवसर था जन्म दिवस प्रभु का
खुशियाँ लेकर  के आया  था |
सबका  कल्याण हुआ  इससे 
अतः कल्याणक कहलाया था || 

वह शुभ दिन आज पुनः आया 
जन जन का मन है हर्षाया | 
करने को वंदन अभिनन्दन 
यह सेवक चरणों में है आया ||

अब आश यही कल्याणक से
मैं बनू आपका अनुगामी |
चलकर पद चिन्हों  पर तेरे 
बनना  है स्वयं मोक्षगामी ||

Wednesday, April 6, 2011

Swatantrata

पंक्षी
क्यों आसमान में उड़ते है ?
क्यों दूर हमसे जाते है ?
क्यों पास नहीं वे आते है ?
क्या वे हमसे डरते है ?
अथवा
है भय उनको प्राणों का  ?
या
जीवन उनको है प्यारा |
नहीं !
भय नहीं है उनको प्राणों का ,
हाँ पसंद है उनको जीवन ,
सबकी तरह 
पर
स्वतंत्र जीवन |
यदि मिले उन्हें वरदान ,
स्वतंत्रता का
तब वे हमसे नहीं डरेंगे |
दूर हमसे नहीं भागेंगे  |
क्योंकि
उन्हें 
नहीं है पसंद
सिर्फ जीवन  |
जीता तो है कैदी भी ,
पर वह  नहीं है खुश |  
क्योंकि        
उसे भी पसंद है वही
जो सबको है ,
सिर्फ जीवन नहीं
वरन 
स्वतंत्र जीवन |
हाँ 
स्वछंद  नहीं,
स्वतंत्र जीवन |

यदि
जीवन ही होता प्यारा ,
तो
क्यों देते बलिदान ,
देश को
लोग करोडो ,
सिर्फ स्वतंत्रता की खातिर |
कैद क्यों होती एक सजा ,
जब जीवन ही होता प्यारा |
अतः
पंक्षी
चाहते है 
जीवन
सबकी तरह  ,
पर
स्वतंत्र  और
सिर्फ 
स्वतंत्र जीवन ........        

Monday, April 4, 2011

Pahle esa Kabhi Hota to Nahi tha

देखे   थे   मैंने  सपने   रातों  में   कई बार |
पर जागते हुए सपनो में, खोता तो नहीं था  ||

हँसता  था  पहले  सबको  हसाता  भी  था  |
पर इस तरह वेबजह, मुस्कुराता तो नहीं था ||
 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

चाहता  था  मिलना  उससे  हर  पल हर घडी |
पर  इस  तरह  सबसे ,छिपता  तो नहीं था  ||

आती  थी  मिलने  वह  भी  मुझसे  कई बार |
पर  इस तरह आंखे कभी  चुराता तो नहीं था  ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||
 
चलता  था  रास्तों  पर  पहले भी हर रोज |
पर रास्तों में कहीं पर , खोता तो  नहीं था ||
  
रोया  था  जिंदगी  में पहले  भी  कई बार |
पर  हँसते  हँसते  कभी, यूँ रोता तो नहीं था ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

रातों को जागना अच्छा लगता था मुझे |
पर  बैठे  बैठे  ही  रातें , बिताता तो नहीं था ||

बातें  करते  करते  कब हो जाती थी शाम  |
पर  इस  तरह कभी चुप , होता तो नहीं था  ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

Thursday, March 31, 2011

Manh Sthiti

जब कोई कोशिश करता है ,
मुझे पकड़ने की 
मुझे जकड़ने की 
मुझे  रोकने की  |
तब मैं,
भाग जाना चाहता हूँ ,
छोड़कर ,
उसे |
जिससे 
कोई रोक न सके ,
और 
मैं उड़ सकूँ ,
खुले आसमान में ,
चाहे वह रोकता हो,
तो रह जाये,
रोकता ही,
अकेला |

  परन्तु 
इसके विपरीत 
वही,
जब कहता है ,
की
जाना है तो चले जाओ,
जाओ जरा क्षितिज तक जाकर आओ,
जाओ उड़ जाओ |
मै  
तुम्हे नहीं रोकता |
तब सोचता हूँ ,
कहाँ  जाऊ 
और  क्यों जाऊ
छोड़कर उसे ,
अतः
मैं नहीं जा पता ,
और 
वही रह जाता हूँ ,
उसी के पास ,
जिससे जाना था 
दूर |
                                 बहुत दूर...................

Pahchan Ki Rah

घट घट कर जीवन फिर मरघट ,
जा  पहुंचा  है  सरपट  सरपट  |
बस  याद  बची  कुछ और नहीं,
कुछ  देर  रही  फिर  याद नहीं ||

थे  लोग  कई  जो  बीत  चुके ,
ऐसे  किस  किस  को याद रखें|
अस्तित्व   बनाने    आये   थे,
अस्तित्व   बनाते   मिट  बैठे ||

अंतिम क्षण तक संघर्ष किया ,
अस्तित्व  बनाने  को  अपना |
पर आश स्वांस के साथ गयी,
और टूट  गया  सारा  सपना ||

सुख जीवन   के  सारे  त्यागे,
पहचान    बनाकर   जाऊंगा |
जीवन भर कठिन परिश्रम कर,
अपनी    पहचान    बनाऊंगा ||

फिर  बीत  गया सारा जीवन ,
दुनिया में पहचान बन गयी |
पहचान बने कुछ दिन गुजरे ,
पर मृत्यु उसके गले पड़ गयी ||

खुद को पहचान  नहीं  पाया ,
खुद जो पहचान बनायीं थी |
जब पाया नव नर तन उसने,
अपनी   पहचान  गवाई थी ||

में देख रहा फिर सोच रहा,
क्यों प्राणी इसमें घूम रहा |
क्यों नहीं  खोजता  वे  राहें ,
जो इसे उन्नति पर ले जाये||

पर    में   भी  हूँ   ऐसे रथ पर,
जो नहीं अभी उन्नति पथ पर|
सो सोच रहा  किस ओर चलूँ ,
जिस पर चलकर सन्मार्ग मिलूं||

पर  समझ नहीं  मुझको  आता ,
कैसे  मंजिल मंजिल को पा जाता|
सो  छोड़  रहा  इसको  तुम  पर,
यदि राह मिले  सब  साथ  चलें ||
          

Friday, March 25, 2011

Paropkar

नदी
प्रारंभ करती है 
अपनी 
जीवन यात्रा |
दोनों ओर,
जीने की आशा ,
और
परोपकार का उद्देश्य
रुपी
तटों को साथ लेकर |
अनवरत 
चलती रहती है,
वगैर किसी स्वार्थ के ,
सभी की प्यास बुझाते हुए |
बाधाएं आती है ,
रास्ता रोकने के लिए ,
परन्तु
असफल रहे
किये गए सभी प्रयास
उनके ,
और नदी पाती है 
आशातीत सफलता |

सभी रुकावटों को 
तोड़कर
एकाकी 
वगैर किसी सहायता के 
और
जब अंत आया तो
इसी आशा से 
की
शायद 
कम कर सके 
खारापन ,
सागर का ,
अर्पण कर 
मीठा जल अपना ,
खो देती है अस्तित्व
विलीन होकर
सागर की गहराइयों में |

यही तो है ,
कहानी
प्रत्येक 
महापुरुष की
उपकार
स्व - का नहीं
पर का उपकार
परोपकार
             परोपकार
                              परोपकार........
 

Najren

आपकी नजरें 
नजारें हैं देखती
और 
हम देखतें हैं
आपका
नजरिया

Tuesday, March 15, 2011

Nigahe

दो  तीर  निगाहों  के  तीखे
घायल दिल को कर देते है |
फिर हाल हुआ क्या जख्मी का
दो  नैन  बयां  कर  देते है ||

दो  नैन  नशीले  पीने पर 
हर  दर्द  ख़त्म  कर देते है |
पर मिलन नयन का नयनों से
मन तृप्त  नहीं कर पाते   है ||

Main Kaun Hu

मेरा मन हो जाता विचलित
उठती  है  लहरें  सागर वत |
आमूलचूल तक सिहरन सी
कर देती  है  मुझको  आहत||
   
ऐसा   तूफान   उफनता   है
कर देता है मुझको आहत |
मेरा   मन  घबरा  जाता  है 
खोई  सी  जाती है हिम्मत ||

जब  उठते  है  कई  प्रश्न 
मेरे जीवन से सम्बंधित |
है प्रश्न कई कोई अंत नहीं
लगता है मानो हो पर्वत ||

मै जीता तो हूँ पर किसको ?  
मेरा जग  से  क्या नाता है ?
क्यों आया हूँ ? क्यों जाऊंगा ?
क्यों दौलत यहाँ कमाऊंगा?

क्यों देख रहा? क्यों जान रहा ?
क्यों सबको अपना मान रहा?
जब जाना है एक दिन सबको 
फिर रिश्ता क्यों पहचान रहा ? 
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( अधूरी कविता )