Shabd jo kabhi sunai na diye

आँखों की नमी को ख़ुशी के आंसू बताना , कहना सब कुछ ठीक है फिर थोडा मुस्कुराना , भले दिल में हो दर्द पर हमदर्द बन जाना , देखा, कितना आसान है किसी भी गम को छुपाना ||

Tuesday, May 24, 2011

कितना आसान है गम को छिपाना

आँखों  की नमी को ख़ुशी के आंसू बताना ,
कहना सब कुछ ठीक है फिर थोडा मुस्कुराना 
भले दिल में हो  दर्द पर  हमदर्द बन जाना ,
देखा,
 कितना आसान  है किसी भी गम को छुपाना 

Saturday, May 14, 2011

जीवन

हम प्रतिसमय 
स्वप्नमय है ,
आँखे 
बंद हो अथवा खुली 
कोई अंतर नहीं |
क्योंकि
जीवन प्रवाह 
अनवरत गतिमान है
दोनों ही परिस्थितियों में 

दृश्यावलोकन 
सतत है 
दोनों हो परिस्थितियों में ,

कुछ दृश्य स्मृत है 
पर कुछ विस्मृत ,
दोनों हो परिस्थितियों में , 

अतः 
जीवन 
एक स्वप्न है 
दोनों ही परिस्थितियों में ........

उन्नति


कहीं हम
उन्नति की राह पर चलने के स्थान पर , राहें उन्नत करने में तो नहीं लगे हुए है ?
यदि हाँ 
तो पहचान की राह छोड़ , राह की पहचान कर चलना होगा |

Saturday, April 23, 2011

पशुओं की पुकार

मानव छोड़ो बुरा आचरण और सीखो तुम सत आचार |
अब छोड़ो   माँस   का भक्षण अपनाओ तुम शाकाहार ||
होता नहीं सहन अब हमसे , थोड़ी सी तो दया विचार |
कहते   मूक     पशु     बेचारे ,  बंद करो ये अत्याचार ||

बंद करो ये     भूचड़खाने      , जिनमे कटते पशु हजार |
अभी समय है बदलो जीवन ,खोलो नहीं नरक का द्वार ||
खोया अगर समय यह तुमने ,कभी नहीं आता दो बार |
कहते   मूक     पशु     बेचारे ,  बंद करो ये अत्याचार ||


विषयों की अग्नि में जलकर , होता नहीं कभी कल्याण |
हड्डी के सम नीरस है, जिसे स्वाद मानकर खाता श्वान  ||
मूक     पशु पर दुराचार कर , बनते हो तुम क्यों बेकार |
कहते   मूक     पशु     बेचारे ,  बंद करो ये अत्याचार ||


छोड़ो  अपना   बुरा क्रूर हठ , और सुनो तुम पशु पुकार |
अभी सम्हल जा नहीं तो आगे ,भटकोगे तुम सब संसार ||
दया धरम को धारण करके , पाओगे तुम सौख्य अपार |
कहते   मूक     पशु     बेचारे ,  बंद करो ये अत्याचार ||

गुरु तुम्हे नमन

हे     श्रमणों     के उन्नायक , गुरुवर अविकारी तुम्हे नमन |
जीवन निर्माता शिल्पिकार , हे गुणों के आगर तुम्हे नमन ||
हे काव्य सृजक साहित्यकार ,हे तपो निधि गुरु तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

हे सौम्य स्वभावी समताधारी , हे करुना सागर तुम्हे नमन |
 जिन धर्म प्रभावक ओजस्वी,हे त्याग मूर्ति गुरु तुम्हे नमन ||
हे जिनवानी के उदघोषक,हे वात्सल्य मूर्ति गुरु तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

हे संत शिरोमणि मुनि प्रवर ,हे ज्ञान उजागर तुम्हे नमन |
हे कठिन साधना में निरत , हे ज्ञान के सागर तुम्हे नमन ||
हे     अमित     गुणों के भंडारी , हे वाणी भूषण तुम्हे नमन |
हे परम दिवाकर तेजस्वी , हे     विद्यासागर     तुम्हे नमन ||

Friday, April 15, 2011

जन्म कल्याणक

आकुलित हुई मानवता थी 
थी बढती हिंसा की धारा | 
तम घोर घनेरा था छाया 
था चिंतित विश्व विकट सारा || 

तब माँ त्रिशला उदयाचल बन
तमहर  दिनकर  लेकर आयीं |
फिर देख वीर  की मुख मुद्रा 
सारे जग  में खुशियाँ छायी ||

हर्षित थी नगरी कुण्डलपुर 
देवों  में खुशियाँ  थी छायीं |
था गर्व  पिता की आँखों में
माँ की अँखियाँ भी भर आयीं ||

पाने को एक  छवि  प्रभु की
वह इन्द्र जमीं पर आया था |
कर नेत्र हजारों से दर्शन ||
मन तृप्त  नहीं कर पाया था ||

अवसर था जन्म दिवस प्रभु का
खुशियाँ लेकर  के आया  था |
सबका  कल्याण हुआ  इससे 
अतः कल्याणक कहलाया था || 

वह शुभ दिन आज पुनः आया 
जन जन का मन है हर्षाया | 
करने को वंदन अभिनन्दन 
यह सेवक चरणों में है आया ||

अब आश यही कल्याणक से
मैं बनू आपका अनुगामी |
चलकर पद चिन्हों  पर तेरे 
बनना  है स्वयं मोक्षगामी ||

Wednesday, April 6, 2011

Swatantrata

पंक्षी
क्यों आसमान में उड़ते है ?
क्यों दूर हमसे जाते है ?
क्यों पास नहीं वे आते है ?
क्या वे हमसे डरते है ?
अथवा
है भय उनको प्राणों का  ?
या
जीवन उनको है प्यारा |
नहीं !
भय नहीं है उनको प्राणों का ,
हाँ पसंद है उनको जीवन ,
सबकी तरह 
पर
स्वतंत्र जीवन |
यदि मिले उन्हें वरदान ,
स्वतंत्रता का
तब वे हमसे नहीं डरेंगे |
दूर हमसे नहीं भागेंगे  |
क्योंकि
उन्हें 
नहीं है पसंद
सिर्फ जीवन  |
जीता तो है कैदी भी ,
पर वह  नहीं है खुश |  
क्योंकि        
उसे भी पसंद है वही
जो सबको है ,
सिर्फ जीवन नहीं
वरन 
स्वतंत्र जीवन |
हाँ 
स्वछंद  नहीं,
स्वतंत्र जीवन |

यदि
जीवन ही होता प्यारा ,
तो
क्यों देते बलिदान ,
देश को
लोग करोडो ,
सिर्फ स्वतंत्रता की खातिर |
कैद क्यों होती एक सजा ,
जब जीवन ही होता प्यारा |
अतः
पंक्षी
चाहते है 
जीवन
सबकी तरह  ,
पर
स्वतंत्र  और
सिर्फ 
स्वतंत्र जीवन ........        

Monday, April 4, 2011

Pahle esa Kabhi Hota to Nahi tha

देखे   थे   मैंने  सपने   रातों  में   कई बार |
पर जागते हुए सपनो में, खोता तो नहीं था  ||

हँसता  था  पहले  सबको  हसाता  भी  था  |
पर इस तरह वेबजह, मुस्कुराता तो नहीं था ||
 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

चाहता  था  मिलना  उससे  हर  पल हर घडी |
पर  इस  तरह  सबसे ,छिपता  तो नहीं था  ||

आती  थी  मिलने  वह  भी  मुझसे  कई बार |
पर  इस तरह आंखे कभी  चुराता तो नहीं था  ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||
 
चलता  था  रास्तों  पर  पहले भी हर रोज |
पर रास्तों में कहीं पर , खोता तो  नहीं था ||
  
रोया  था  जिंदगी  में पहले  भी  कई बार |
पर  हँसते  हँसते  कभी, यूँ रोता तो नहीं था ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

रातों को जागना अच्छा लगता था मुझे |
पर  बैठे  बैठे  ही  रातें , बिताता तो नहीं था ||

बातें  करते  करते  कब हो जाती थी शाम  |
पर  इस  तरह कभी चुप , होता तो नहीं था  ||

 पता  नहीं  अब  क्या हो  गया  है  मुझे |
 पहले  ऐसा  कभी  ,होता  तो नहीं था||

Thursday, March 31, 2011

Manh Sthiti

जब कोई कोशिश करता है ,
मुझे पकड़ने की 
मुझे जकड़ने की 
मुझे  रोकने की  |
तब मैं,
भाग जाना चाहता हूँ ,
छोड़कर ,
उसे |
जिससे 
कोई रोक न सके ,
और 
मैं उड़ सकूँ ,
खुले आसमान में ,
चाहे वह रोकता हो,
तो रह जाये,
रोकता ही,
अकेला |

  परन्तु 
इसके विपरीत 
वही,
जब कहता है ,
की
जाना है तो चले जाओ,
जाओ जरा क्षितिज तक जाकर आओ,
जाओ उड़ जाओ |
मै  
तुम्हे नहीं रोकता |
तब सोचता हूँ ,
कहाँ  जाऊ 
और  क्यों जाऊ
छोड़कर उसे ,
अतः
मैं नहीं जा पता ,
और 
वही रह जाता हूँ ,
उसी के पास ,
जिससे जाना था 
दूर |
                                 बहुत दूर...................

Pahchan Ki Rah

घट घट कर जीवन फिर मरघट ,
जा  पहुंचा  है  सरपट  सरपट  |
बस  याद  बची  कुछ और नहीं,
कुछ  देर  रही  फिर  याद नहीं ||

थे  लोग  कई  जो  बीत  चुके ,
ऐसे  किस  किस  को याद रखें|
अस्तित्व   बनाने    आये   थे,
अस्तित्व   बनाते   मिट  बैठे ||

अंतिम क्षण तक संघर्ष किया ,
अस्तित्व  बनाने  को  अपना |
पर आश स्वांस के साथ गयी,
और टूट  गया  सारा  सपना ||

सुख जीवन   के  सारे  त्यागे,
पहचान    बनाकर   जाऊंगा |
जीवन भर कठिन परिश्रम कर,
अपनी    पहचान    बनाऊंगा ||

फिर  बीत  गया सारा जीवन ,
दुनिया में पहचान बन गयी |
पहचान बने कुछ दिन गुजरे ,
पर मृत्यु उसके गले पड़ गयी ||

खुद को पहचान  नहीं  पाया ,
खुद जो पहचान बनायीं थी |
जब पाया नव नर तन उसने,
अपनी   पहचान  गवाई थी ||

में देख रहा फिर सोच रहा,
क्यों प्राणी इसमें घूम रहा |
क्यों नहीं  खोजता  वे  राहें ,
जो इसे उन्नति पर ले जाये||

पर    में   भी  हूँ   ऐसे रथ पर,
जो नहीं अभी उन्नति पथ पर|
सो सोच रहा  किस ओर चलूँ ,
जिस पर चलकर सन्मार्ग मिलूं||

पर  समझ नहीं  मुझको  आता ,
कैसे  मंजिल मंजिल को पा जाता|
सो  छोड़  रहा  इसको  तुम  पर,
यदि राह मिले  सब  साथ  चलें ||