Shabd jo kabhi sunai na diye

आँखों की नमी को ख़ुशी के आंसू बताना , कहना सब कुछ ठीक है फिर थोडा मुस्कुराना , भले दिल में हो दर्द पर हमदर्द बन जाना , देखा, कितना आसान है किसी भी गम को छुपाना ||

Tuesday, February 15, 2011

! Najariya !

है वस्तु एक ,
व्यक्ति एक,
एक रूप ,
रंग एक,
पर है नहीं
उसका,
उपयोग एक,
अर्थ एक,
कार्य एक,
कर्त्तव्य एक,
हर एक व्यक्ति
के लिए,
क्योंकि बस
अंतर  है
एक -
नजरिया !

Vyang (On Our Culture)

फैशन  की  बढती ये , ये तो आंधी है विदेशी 
पश्चिम की सभ्यता  को साथ में ले आई है |
लगता  है  मानो  जैसे  फैशन  के डंडे द्वारा 
कोई गाय  घास छोड़ , मांस को ललचाई है ||

जींस व टी  शर्ट से  सजा है सारा तन बदन 
बच्चा रोया आँचल माँ का कहो कैसे पायेगा |
लाएगी  कहा से आँचल  लेकर विदेशी जामा
बोलो क्या फिर टी शर्ट से पल्लू जुड़ जायेगा ||
 

Monday, February 14, 2011

Bat Purani

होता था हमें भी इंतजार किसी का 
चाहते थे पाना हम प्यार किसी का |
पर कर न सके हम इजहार ए इश्क
    डरते थे सुनने से इनकार किसी का ||

मैं मन की बात मन में दबाये ही रहा 
खौफ़  ए  इनकार  बढता  रहा  सदा |
अब नहीं जाना मुझे कभी उस डगर 
होता था जहाँ पर दीदार किसी की ||

Sunday, February 13, 2011

Atma Sambodhan


समय   नहीं  रुकता  पल को
क्यों व्यर्थ  इसे  तू खोता है |
जब पास में  था तो सोता था
अब बीत   गया  तो रोता है ||

पर नहीं  लौटकर  आता जब 
क्यों मातम  व्यर्थ मनाता है |
होकर  निराश  क्यों  जीवन से
पल नित नए व्यर्थ गंवाता है ||

क्यों  नहीं  जगता   निद्रा   से 
जब  नया  सवेरा  आता  है  |
यह   आशाओं  का  नवल सूर्य
जब तुझको राह  दिखाता है  ||


अब जाग तोड़कर स्वप्न चक्र
युद्ध   स्थल   तुझे बुलाता है |
यह  कार्य क्षेत्र  की  रणभूमि
क्यों   इससे  तू  घबराता है ||

अब चौंक नहीं यह देख चमक
तलवार   जिसे   तू उठाता है |
मेहनत  का  है  यही   खड्ग 
जो तुझको विजय दिलाता है ||


अब   शत्रु   दल  तेरे    आगे 
इसे दलन तुही कर सकता है |
बाधाओं     रुपी    यह    शत्रु 
तेरी राह नहीं ढक सकता है||

मत रुकना   जीवन मैं तब  तक
जब तक  ह्रदय नहीं रुक जाता |
लड़ते रहना    अब उस पल तक
जब तक तू विजय   नहीं पता ||

Wednesday, February 9, 2011

Mere Shabd Jo Mere Na Ho Sake

                                    जो मै कहना चाहता हूँ  वह कह नहीं पता; मन की बात अपने मन में ही दबाये रह जाता हूँ कभी कभी  सोचता हूँ की ये शब्द मेरे मुह से निकलेंगे तो मेरे ही हुए सो कुछ भी बोल सकता हूँ | पर अगले ही पल फिर ख़याल आता है कही मुह से निकलकर ये तीर न बन जाये | इसीलिए नया रास्ता खोजा है मन की बात  को कहने का , उन शब्दों को बाहर निकलने का जो मेरे होते हुए भी मेरे न हो सके |