Shabd jo kabhi sunai na diye

आँखों की नमी को ख़ुशी के आंसू बताना , कहना सब कुछ ठीक है फिर थोडा मुस्कुराना , भले दिल में हो दर्द पर हमदर्द बन जाना , देखा, कितना आसान है किसी भी गम को छुपाना ||

Monday, February 21, 2011

Najren

आपकी नजरें 
नज़ारे है देखती,
और
हम देखतें 
है,
आपका
नजरिया!.........  

Virodh

सूरज सी रोशनी 
में
निराशाओं का अँधेरा,
व 
अमावस से अंधकार 
में
आशाओं की किरण ,
स्पष्ट दिखाई देती है  |
क्योंकि
आशाओं की किरण 
विलुप्त हो जाती है,
सूरज सी रोशनी में ,
और
निराशाओं का अँधेरा ,
खो जाता है
गहरे अंधकार में |
विरोध में ही वास्तु
का अस्तित्व दिखाई देता है |
अतः
चारों अपना अस्तित्व दिखाता,
दिखाई दे रहा है
विरोध!!!!....   

Sunday, February 20, 2011

Lakshya

चल उठ बढ़ चल निशदिन अविरल 
अड़चन   कर   दूर   निरत  आगे |
हो  ध्येय  यदि द्रढ़तम निश्चित 
वही  ध्यान  सतत  मन में जागे ||

हो साथ कोई या  कोई नहीं
हो  राह  वही या राह नयी |
हो  मित्र  कोई हो या  शत्रु 
हो फूल कई या शूल कहीं ||

संकल्प शक्ति यदि जागे अरे 
तब व्यक्ति किसी से नहीं डरे |
बढ चले यदि अपने पथ पर
परवाह  व्यर्थ  की  नहीं  करे ||

विघ्नों   और   बाधाओं   का
परिहार वही कर सकता है |
चलकर ऐसे कंटक पथ पर 
मंजिल  को  पा  सकता है ||

Friday, February 18, 2011

कविता लिखने का प्रयास पिछले कुछ  वर्षों से करता आ रहा हूँ पर वे कवितायेँ कभी डायरी से बाहर नहीं निकल सकी क्योंकि मैं हिम्मत नहीं कर पाया उन्हें किसी भी रूप मैं बाहर निकालने की | इसके कारण कई थे , जैसे की मैं सोचता था की किसी को मेरी कविताये पसंद नहीं आयेंगी , मुझे अच्छा लिखना नहीं आता | और भी इस तरह के कई विचार होते थे पर अब सोचता हूँ की दूसरों की पसंद मैं कैसे निर्धारित कर सकता हूँ अतः अब मैंने यह बीच का रास्ता निकला है अपनी कवितायेँ ब्लॉग पर पोस्ट करने का |
अब जिसकी इच्छा हो पढ़े अच्छी लगे तो ग्रहण करे न लगे तो कम से कम अपनी मूल्यवान सलाह तो दे ही सकता है |

Ma ka chitra

मन के कागज पर एक चित्र 
जो अद्भुत है पर नहीं विचित्र |
चिर परिचित है हम सब उससे 
वह गंगा  से  ज्यादा पवित्र ||

जो नहीं मिटाया जा सकता 
जो नहीं भुलाया जा सकता |
करले कोई कोशिश कितनी
पर नहीं हटाया जा सकता ||

नहीं  ऐसा  कोई चित्रकार 
जो  यह  चित्र  बना  पाए |
वह सहज स्वतः सबके भीतर 
बन जाता है मन कागज पर ||

ममता  का  सुन्दर  मधुर रंग
खुशियों के जल में जा घुलता |
फिर मिलकर प्रेम की कूची से 
मन के  कागज  को रंग देता ||

तब  बनता  है  एक  अक्श 
जो  होता  है  सबको  प्यारा |
माँ  का  वह  चेहरा   होता
इस दुनिया में सबसे न्यारा  ||

सारे  रंग  तो  फीके  पड़ते 
पर   यह  रंग  अनोखा  है |
जैसे  जैसे   समय  बीतता
गहरा      होता   जाता   है ||

Wednesday, February 16, 2011

Antar

होते है तरीके
जीने के ,
इस दुनिया में 
कई ,
इसलिए तो है
अंतर,
आपमें और हममे ,
क्योंकि
आप
अपनी पसंद का
हर कार्य करते है,
और 
हम,
करते है हर कार्य 
अपनी पसंद बनाकर|
आप
करते है
अपने शौक के कार्य,
और 
हम ,
जो भी है करते,
करते है
शौक से....
.............

Samay

जिंदगी  का  एक  दिन और ढल गया
वर्तमान से वही अतीत में बदल गया |
लगता    है  जैसे  कोई   पूछ   रहा   हो 
कितना समय और व्यर्थ निकल गया??

समय  निकला  है  और निकल जायेगा 
पर   सवाल   का  जबाब  नहीं आयेगा |
क्योंकि गंवाया है व्यर्थ में कितना समय??
गिनेगे तो समय और व्यर्थ निकल जायेगा||

बचने   को   समय   खुद   बदलना  पड़ेगा
उचाईयों  को  पाना  है  तो  जलना पड़ेगा |
क्योंकि समय तो गतिमान है रुकता नहीं
यदि  पाना  है  मंजिल  तो चलना पड़ेगा ||

पर चलते है कई लोग मंजिल नहीं पाते
होकर  के  पथ  भ्रष्ट भटकते रह  जाते |
क्योंकि  राह  दिखने  वाले  तो  बहुत है 
पर छोड़कर मझधार वे आगे नहीं आते||

चलना  है  अकेले  यदि  पाना  है   मंजिल
मिलेंगी रास्ते भर कठिनाइयों की महफ़िल|
जब  तक   है   दम   आशा    ना   छोड़ना 
पा  जाओगे   मंजिल   होगे  यदि  काबिल||

Tuesday, February 15, 2011

! Najariya !

है वस्तु एक ,
व्यक्ति एक,
एक रूप ,
रंग एक,
पर है नहीं
उसका,
उपयोग एक,
अर्थ एक,
कार्य एक,
कर्त्तव्य एक,
हर एक व्यक्ति
के लिए,
क्योंकि बस
अंतर  है
एक -
नजरिया !

Vyang (On Our Culture)

फैशन  की  बढती ये , ये तो आंधी है विदेशी 
पश्चिम की सभ्यता  को साथ में ले आई है |
लगता  है  मानो  जैसे  फैशन  के डंडे द्वारा 
कोई गाय  घास छोड़ , मांस को ललचाई है ||

जींस व टी  शर्ट से  सजा है सारा तन बदन 
बच्चा रोया आँचल माँ का कहो कैसे पायेगा |
लाएगी  कहा से आँचल  लेकर विदेशी जामा
बोलो क्या फिर टी शर्ट से पल्लू जुड़ जायेगा ||
 

Monday, February 14, 2011

Bat Purani

होता था हमें भी इंतजार किसी का 
चाहते थे पाना हम प्यार किसी का |
पर कर न सके हम इजहार ए इश्क
    डरते थे सुनने से इनकार किसी का ||

मैं मन की बात मन में दबाये ही रहा 
खौफ़  ए  इनकार  बढता  रहा  सदा |
अब नहीं जाना मुझे कभी उस डगर 
होता था जहाँ पर दीदार किसी की ||